Sunday, 20 August 2017

कब रुकेंगी ट्रेन दुर्घटनाएं!

सोशल मीडिया पर रविवार को मुजफ्फरनगर ट्रेन हादसे के बाद तेजी से फैली दो रेलवे कर्मचारियों की टेलीफोन पर हुई बातचीत में शनिवार को उत्तर प्रदेश में हुई ट्रेन दुर्घटना में 'लापरवाही' के संकेत मिले हैं. इस क्लिप में एक रेलवे कर्मचारी को स्पष्ट रूप से यह कहते सुना जा रहा है, "रेलवे ट्रैक के एक भाग पर वेल्डिंग का काम चल रहा था. लेकिन मजदूरों ने ट्रैक के टुकड़े को जोड़ा नहीं और इसे ढीला छोड़ दिया. क्रासिंग के पास गेट बंद था. ट्रैक का एक टुकड़ा लगाया नहीं जा सका था और जब उत्कल एक्सप्रेस पहुंची तो इसके 14 कोच पटरी से उतर गए."
ऑडियो क्लिप में उसे यह कहते सुना जा रहा है, "जिस लाइन पर काम चल रहा था, न तो उसे ठीक किया गया और न ही कोई झंडा या साइनबोर्ड (रोकने के संकेत के तौर पर) लगाया गया. यह दुर्घटना लापरवाही की वजह से हुई. ऐसा लगता है कि सभी (संबंधित कर्मचारी) निलंबित होंगे." इस पर दूसरे ने जवाब दिया दिया कि जूनियर इंजीनियर व दूसरे अधिकारियों सहित सभी के खिलाफ कार्रवाई की संभावना है. दोनों एक दूसरे से यह भी बताते हैं कि मजदूरों ने अपना काम समाप्त करने के बाद कुछ उपकरण ट्रैक के बीच में छोड़ दिया था. कम से कम वे मशीन को हटा सकते थे और एक लाल झंडा वहां लगा सकते थे, रेलवे बोर्ड के अधिकारी मोहम्मद जमशेद ने संवाददाताओं से कहा, "हमें मीडिया से दो रेलवे कर्मचारियों के बीच बातचीत का पता चला है. इसमें कहा गया है कि ट्रेन के पटरी से उतरने की घटना लापरवाही की वजह से हुई. हम क्लिप की प्रमाणिकता की जांच करेंगे."
इस पर खतौली स्‍टेशन के सुपरिटेंडेंट राजेंद्र सिंह ने कहा कि हमको किसी ट्रैक रिपेयर की जानकारी नहीं थी. अगर कोई रिपेयर का काम होगा तो वो इंजीनियरिंग विभाग को पता होगा, हमको जानकारी नहीं थी. हमारी ओर से कोई गलती नहीं हुई, कोई सिग्‍नल गलत नहीं दिया गया. इसके उलट मुजफ्फरनगर इंजीनियरिंग विभाग का कहना है कि ट्रैक पर निश्चित रूप से काम चल रहा था. स्टेशन को बताया गया था कि ट्रैक असुरक्षित है. Blued जॉइंट की प्लेट क्रैक थी. उसको ठीक करने के लिए 20 मिनट का ब्लॉक मांगा गया था यानी 20 मिनट तक कोई ट्रेन वहां से ना गुज़रे ये मांग की गई थी. यह दो जिम्मेदार लोगों के बीच संवादहीनता की स्थिति भी हो सकती है या एक दूसरे पर आरोप मढ़ने की कोशिश. जांच में सबकुछ अवश्य स्पष्ट होने चाहिए.  रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने ट्रेन हादसे की जांच के आदेश दिए हैं. रविवार २० अगस्त की शाम तक प्राप्त समाचार के अनुसार इस हादसे में रेलवे के कई कर्मचारियों, अधि‍कारियों पर गाज गिरी है. उत्तर रेलवे ने सीनियर डिविजनल इंजीनियर और उनके मातहत काम करने वाले तीन कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया है. शुरुआती जांच के बाद नॉर्दन रेलवे के जनरल मैनेजर ने जिन कर्मचारियों को सस्पेंड किया है, उनमें दिल्ली डिवीजन के सीनियर डिविजनल रेलवे इंजीनियर आरके वर्मा, दिल्ली डिवीजन मेरठ के असिस्टेंट इंजीनियर रोहित कुमार, मुजफ्फरनगर के सीनियर सेक्शन इंजीनियर इंदरजीत सिंह और खतौली के जूनियर इंजीनियर प्रदीप कुमार शामिल हैं.  इनके अलावा उत्तर रेलवे के चीफ ट्रैक इंजीनियर का ट्रांसफर कर दिया गया है. डीआरएम दिल्ली और जीएम उत्तर रेलवे को छुट्टी पर भेज दिया गया है. इसी तरह रेलवे बोर्ड के सदस्य, इंजीनियरिंग को भी छुट्टी पर भेज दिया गया है.
मोदी सरकार आने के बाद से यह 8 वां बड़ा ट्रेन हादसा है. इस दुर्घटना के साथ ही रेलवे सुरक्षा को लेकर एक बार फिर से बड़े सवाल खड़े हो गए हैं. 
1-
मुजफ्फनगर में ट्रेन पटरी से उतरी : खतौली के पास हुई दुर्घटना में अब तक 32 लोगों के मारे जाने की खबर है जबकि 200 यात्री घायल हैं. पहले इस घटना के पीछे आतंकी साजिश की आशंका जताई जा रही थी. लेकिन चश्मदीदों के मुताबिक यह रेलवे विभाग की लापरवाही का नतीजा है. फिलहाल इस मामले में जांच रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ साफ तौर पर कहा जा सकेगा.
2-
पुखरायां के पास हुई दुर्घटना : पिछले साल 20 नवंबर को कानपुर के पास पुखरायां में रेल हादसा हुआ था जिसमें 150 लोगों की मौत हो गई थी और 200 घायल हुए थे.
3-
भदोही ट्रेन दुर्घटना : पिछले साल 25 जुलाई को भदोही में मडुआडीह-इलाहाबाद पैसेंजर ट्रेन से एक स्कूल वैन टकरा गई थी जिसमें 7 बच्चों की जान चली गई थी.
4-
बछरावां रेल हादसा : 20 मार्च 2015 को देहरादून से वाराणसी जा रही जनता एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी. इस दुर्घटना में 34 लोग मारे गए थे.  यह घटना बछरावां रेलवे स्टेशन से थोड़ी दूर पर हुआ थी.
5-
मुरी एक्सप्रेस हुई हादसे का शिकार : साल 2015 में कौशांबी जिले के सिराथू रेलवे स्टेशन के पास मुरी एक्सप्रेस दुर्घटना का शिकार हो गई थी. इसमें 25 यात्री मारे गए थे और 300 घायल हो गए थे. 
6- 10
मिनट के अंदर दो हादसे : साल 2015 में मध्य प्रदेश के हरदा के पास 10 मिनट के अंदर दो ट्रेनें दुर्घटनाग्रस्त हो गईं. इटारसी-मुंबई रेलवे ट्रैक पर  मुंबई-वाराणसी कामायनी एक्सप्रेस और पटना-मुंबई जनता एक्सप्रेस पटरी से उतर गईं. पटरी धंसने से यह हादसा हुआ था. इस  दुर्घटना में 31 मौतें हुई थीं.
 7-
गोरखधाम एक्सप्रेस भी हुई हादसे का शिकार : 26 मई 2014 को संत कबीर नगर के चुरेन रेलवे स्टेशन के पास गोरखधाम एक्सप्रेस और मालगाड़ी में भिड़ंत हुई थी. इस दुर्घटना में 22 लोगों की मौत हुई थी.
8-
रायगढ़ में पटरी से उतरीं बोगियां : 2014 में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में ट्रेन का इंजन और 6 डिब्बे पटरी से उतर गए थे. इस हादसे में 20 लोगों की मौत हुई थी और 124 घायल हो गए थे.
ऐसे में हाल के वर्षों में बढ़े ट्रेन हादसों के बाद रेल सफर को लेकर मन में उठने लगे ये सवाल... ऐसी दुर्घटनाएं हो क्यों रही: 
ऐसे में लगता है कि क्या रेलवे ने यह मान लिया है कि ऐसी घटनाओं को रोका नहीं जा सकता? अगर नहीं, तो क्या वजह है कि अचानक ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ गई है? सवाल सिर्फ एक एक्सीडेंट का नहीं है, सवाल है कि ऐसी दुर्घटनाएं हो क्यों रही हैं? कभी सबसे योग्य विभागों में गिना जाने वाला रेलवे अचानक अयोग्य से क्यों लगने लगा? अब बहस इस पर नहीं होनी चाहिए कि दुर्घटना हुई कैसे? अब चर्चा इस पर होनी चाहिए कि आखिर रेल दुर्घटनाएं रुकेंगी कब और कैसे? हैरानी की बात है कि ट्विटर पर इतना एक्टिव यह डिपार्टमेंट अक्सर इंफ्रास्ट्रक्चर और मेंटेनेंस के नाम पर धन की कमी का रोना रोता है। उत्कल एक्सप्रेस हादसे' सहित पिछले पांच सालों में देश में 586 रेल दुर्घटनाएं चुकी हैं. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इन 586 रेल हादसों में से करीब 53 फीसदी घटनाएं ट्रेन के पटरी से उतरने के कारण हुई हैं.
हम बुलेट ट्रेन का सपना देख रहे हैं. उस दिशा में काम भी हो रहा है. सोचिये अगर हमारी रेल ट्रैक्स का यही हाल रहा तो किसी सफल होगी बुलेट ट्रेन की सेवा. अधिकांश लोगों का मानना है कि पहले जो ट्रेने चल रही हैं वही सही समय पर और सुरक्षित चलें. उनमे बद इन्तजामी को दूर किया जाय. सफाई व्यवस्था, भोजन और रख-रखाव की सुविधा चुस्त दुरुस्त हों. रेलवे के कर्मचारी और अधिकारी अपनी जिम्मेदारी समझें. रेल मंत्री इस्तीफ़ा न भी दें तो आगे की कार्रवाई को और बेहतर बनायें. इतनी अपेक्षा तो होती है ताकि रेल यात्री जो उचित किराया देकर रेल में सफ़र करते हैं, अपनी मंजिल पर सुरक्षित पहुँच सकें. दुर्घटनाओं, हादसों से सबक लेते हुए सुरक्षा नियमों का पूर्णतया पालन आवश्यक है ताकि आगे किसी भी घटना/दुर्घटना को रोका जा सके.

-    जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.   

Saturday, 12 August 2017

हादसा नहीं हत्या – कैलाश सत्यार्थी(नोबल पुरस्कार विजेता)

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर सरकारी अस्पताल  में पांच दिनों के भीतर हुई 60 से अधिक बच्चों की दर्दनाक मौत हादसा नहीं हत्या है - यह बातें नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने ट्वीट कर कहा है. कैलाश सत्यार्थी ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया ट्विटर पर दी है. उन्होंने कहा है कि बिना ऑक्सीजन के 30 बच्चों की मौत हादसा नहीं, हत्या है. क्या हमारे बच्चों के लिए आजादी के 70 सालों का यही मतलब है. कैलाश ने एक और ट्वीट में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ से अपील करते हुए लिखा है कि आपका एक निर्णायक हस्तक्षेप दशकों से चली रही भ्रष्ट स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक कर सकती है ताकि  ऐसी घटनाओं को आगे रोका जा सके.
गोरखपुर पिछले 20 सालों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का चुनाव क्षेत्र है. मुख्यमंत्री ने इस मामले में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत की खबरों से इनकार कर दिया. जबकि अस्पताल प्रशासन के साथ साथ अस्पताल के बाल रोग विभाग को इसकी सूचना चिट्ठी के जरिए दी गई थी. इस चिट्ठी में कहा गया था कि अस्पताल में ऑक्सीजन सिलिंडर की कमी है. जान गंवाने वाले बच्चों में 5 नवजात शिशु भी थे. न मौतों की वजह आधिकारिक तौर पर भले ही नहीं बताई जा रही हो लेकिन कहा जा रहा है कि इसके पीछे ऑक्सीजन की कमी ही कारण है. जबकियु पी सरकार का कहना है कि ऑक्सीजन की कमी से मौत नहीं हुई. अब आइये जानते है उन दो चिट्ठियों के बारे में -
पहली चिट्ठी एक अगस्त की है जो अस्पताल में ऑक्सीजन सिलिंडर सप्लाई करने वाली कंपनी ने लिखी थी जिसमें लिखा गया है कि वे सिलिंडर की सप्लाई नहीं कर पाएंगे क्योंकि 63 लाख रुपये से ज़्यादा का बकाया हो गया है. ये चिट्ठी बी आर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल के साथ साथ गोरखपुर डी एम और उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा विभाग महानिदेशक को भेजी गई है.
दूसरी चिट्ठी 10 अगस्त की है जो ऑक्सीजन सिलिंडर सप्लाई करने वाली कंपनी के कर्मचारियों ने लिखी थी. ये कर्मचारी अस्पताल में सिलिंडर देने का काम करते थे. ये चिट्ठी अस्पताल के बाल रोग विभाग के प्रमुख को संबोधित करते हुए एक चिट्ठी लिखी गई थी जिसमें ऑक्सीजन सिलिंडर सप्लाई कम होने की जानकारी दी गई है.
इस बीच उसी हॉस्पिटल में कार्यरत डॉ. कफील अहमद का नाम सुर्ख़ियों में आया है जिन्होंने अपने बल बूते काफी ऑक्सीजन सिलिंडर उपलब्ध कराये और उसके लिए अपने पास से नगद रुपये भी दिए. फिर भी उन्हें अफ़सोस है कि वे मासूमों की जान नहीं बचा सके.
शनिवार को जायजा लेने पहुंचे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि यह सीधे सीधे लापरवाही का मामला है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस्तीफा दे देना चाहिए. मौके पर पहुंचे इस डेलीगेशन में आजाद के अलावा, आरपीएन सिंह, राज बब्‍बर और प्रमोद तिवारी मौजूद थे. कांग्रेस के अलावा अन्य विपक्षी दलों ने भी अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी है... और ये प्रतिक्रियाएं भी राजनीतिक होती हैं इसमें कोई दो राय नहीं है.
गोरखपुर बी आर डी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत की वजह ऑक्सीजन सिलिंडर ख़त्म होने की बात सामने आई है. मेडिकल कॉलेज के सेंट्रल ऑक्सीजन सप्लाई यूनिट में ज़िलाधिकारी के आदेश पर नई संस्था मोदी फ़ार्मा ने सप्लाई शुरू की है जबकि पहले पुष्पा सेल्स नाम की कंपनी सप्लाई करती थी जिसका 63 लाख रुपये से ज़्यादा बकाया है. इसके बाद उसने सप्लाई बंद कर दी.
उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि सभी मौतें ऑक्सीजन सप्लाई रुकने से नहीं हुई हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित समिति प्रकरण की जांच करेगी और किसी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा. योगी ने कहा कि तथ्य को मीडिया सही तरीके से पेश करे. सीएम योगी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में हादसे से ज्यादा अपने कार्यों पर जोर दिया. उन्होंने अस्पताल के दौरे के अलावा पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य इंतजाम पर सफाई दी.
इस बीच गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल डॉक्टर राजीव मिश्र ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने प्रिंसिपल के इस्तीफे की खबर की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है लेकिन हम उन्हें पहले ही निलंबित कर चुके हैं और उनके खिलाफ जांच भी शुरू की गयी है. हालाँकि इन्ही स्वास्थ्य मंत्री का बेतुका बयान भी सुर्ख़ियों में था कि अगस्त में बच्चे मरते ही हैं. इसमें कितनी संवेदनहीनता है साफ़ साफ़ नजर आ रहा है. यही हादसा दिल्ली या किसी गैर भाजपा सरकार के शासन वाले राज्य में होता तो तुरन्त ही मुख्य मंत्री का इस्तीफ़ा मांग लिया जाता और भाजपा के ही कार्यकर्ता उस सरकार की ईंट से ईंट बजा देते.
इलाहाबाद में एक सभा में भी योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि उनके गृह नगर में बच्चों की मौत गंदगी भरे वातावरण और खुले में शौच के चलते हुई है. आदित्यनाथ ने कहा, "मच्छरों से फैलने वाली कई बीमारियां हैं, जिसमें इनसेफलाइटिस भी शामिल है.
मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि इस अस्पताल में बच्चों की मौत का सिलसिला 7 अगस्त को ही शुरू हो गया था. 9 तारीख की आधी रात से लेकर 10 तारीख की आधी रात को 23 मौतें हुईं जिनमें से 14 मौतें नियो नेटल वॉर्ड यानी नवजात शिशुओं को रखने के वॉर्ड में हुई जिसमें प्रीमैच्योर बेबीज़ रखे जाते हैं. शनिवार को अस्‍पताल में ऑक्‍सीजन सिलिंडर सप्‍लाई करने वाली कंपनी पुष्‍पा सेल्‍स के मालिक मनीष भंडारी के घर पर छापा मारा गया था. मुख्यमंत्री खुद मौके पर नहीं पहुंचे इसका लोगों में अच्छा खासा रोष है. जबकि दो दिन पहले वे उसी अस्पताल में निरीक्षण और मीटिंग करने गए थे.
सवाल यही है कि इस हादसे का जिम्मेवार कौन है? एक प्रिंसिपल को तो सूली पर चढ़ा दिया गया. उनके बारे में यह भी खबर छपी है कि वे ऑक्सीजन सप्लायर से कमीसन लेते थे. कमीसन नहीं मिलने की वजह से ही सप्लायर का पैसा रोका गया.
बच्चों की मौत के बाद अब मेडिकल कॉलेज के कर्मचारी बता रहे हैं कि मैडम (मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य राजीव मिश्र की पत्नी) सामान्य रवायत से दो फीसद ज्यादा कमीशन चाहती थीं, इसीलिए उन्होंने ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का भुगतान लटका रखा था. चिकित्सा शिक्षा विभाग के कर्मचारी बताते हैं कि कंपनी अपना बकाया मांग रही थी जबकि मैडम ज्यादा कमीशन का तगादा कर रही थीं. कर्मचारियों के मुताबिक प्रदेश के मेडिकल कॉलेज और सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति पर 10 फीसद का कमीशन तय है. आपूर्ति करने वाली कंपनियां और आपूर्ति मंजूर करने वाले अधिकारियों के बीच बिना मांगे ईमानदारी से यह लेन-देन चलता रहता है. यह भ्रष्टचार मुक्त भारत का सच.
अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाले अंकुर बताते हैं कि टैंकर के जरिये सप्लाई की जाने वाली लिक्विड ऑक्सीजन औसतन चार से साढ़े चार रुपये प्रति लीटर की दर पर मिलती है, जबकि 30 लीटर ऑक्सीजन का सिलेंडर 250 रुपये यानी करीब आठ रुपये प्रति लीटर की दर से मिलता है. सिलेंडर का दाम दोगुना होने के कारण 10 फीसद की दर से कमीशन भी दोगुना हो जाता है. मेडिकल कॉलेज के कर्मचारी बताते हैं कि इसीलिए ऑक्सीजन वाले सिलेंडरों की खपत सामान्य जरूरत से ज्यादा कराई जाती है.
दो पत्र ऐसे हैं जो बीआरडी अस्पताल प्रशासन के दावों की पोल खोलने को पर्याप्त हैं. कंपनी ने बकाया भुगतान का हवाला देकर आक्सीजन देने से मना कर दिया था. यदि कहा जाए कि इन मौतों के लिए अधिकारियों की लापरवाही पूरी तरह जिम्मेदार है तो यह गलत नहीं होगा. मेडिकल कालेज के नेहरू अस्पताल में पुष्पा सेल्स कंपनी द्वारा लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई की जाती है.
चाहे जो भी कारण हो दोषी पर कार्रवाई होनी चाहिए. भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी है कि हम मासूमों की जिन्दगी से भी कोई वास्ता नहीं रह. काश कि कभी इनके परिजन भी ऐसी संकट से जूझ रहे होते! पर इनके परिजन तो प्राइवेट हॉस्पिटल में सुरक्षित रहते हैं. जनता की शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार की होती है. सरकर इसीलिए तो कर वसूल करती है ताकि जनता को सुविधा मुहैया कराई जा सके पर यहाँ तो ऊपर से नीचे तक बंदर बाँट चलता रहता है.
हर बात में ७० साल का इतिहास और कांग्रेस शासन को दोषी ठहराना गलत बात है. अब आपकी सरकार तीन साल से केंद्र में है. उत्तर प्रदेश में भी अप्रत्याशित बहुमत मिला है. आपने कहा था गद्धामुक्त सड़क वह भी तस्वीरें बयान करती हैं, गड्ढामुक्त हुआ या गद्धायुक्त हुआ है. आदरणीय योगी जी और मोदी जी अभी भी देश को आपसे बहुत कुछ अपेक्षा है कृपया जनता को निराश मत कीजिए. उम्मीद है इस बार १५ अगस्त को कुछ और नई घोषणाएं करंगे. नए भारत के लिए अपने बढ़ते क़दमों की आहट भी अवश्य ही सुनायेंगे! जय हिन्द!

– जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.  

Saturday, 29 July 2017

जहाँगीर रतन जी दादाभाई(जे आर डी) टाटा

जमशेदपुर का दूसरा नाम टाटानगर भी है. यह झारखंड के दक्षिणी हिस्से में स्थित पूर्वी सिंहभूम जिले का हिस्सा है. जमशेदपुर की स्थापना जमशेदजी नुसेरवांजी टाटा ने की थी. 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (टिस्को) की स्थापना से इस शहर की बुनियाद पड़ी. इस जगह की तलाश में भूवैज्ञानिकों को करीब 3 साल का वक्त लगा था.
टाटा ग्रुप के जहांगीर रतनजी दादाभाई (जेआरडी) टाटा का 29 जुलाई को जन्मदिन है. सर नॉवरोजी सकटवाला की 1938 में मृत्यु हो जाने के बाद जेआरडी टाटा को टाटा ग्रुप सौंपा गया था. इसी मौके पर हम बता रहे हैं टाटा स्टील और जमशेदपुर शहर से जुड़ी कुछ बातें...
ऐसा माना जाता है कि 19 वीं शताब्दी के आस पास जमशेदजी नुसेरवान जी टाटा पिट्टसबर्ग गए थे और वहां के भूवैज्ञानिकों से मदद मांगी कि वह उनके लिए एक ऐसी जगह चुने जहां वो अपने सपने, भारत के पहले स्टील कंपनी की स्थापना कर सकें. ऐसी जगह की खोज में करीबन 3 साल लग गए जो प्राकृतिक संसाधन के मामले में संपन्न हो. ऐसी जगह अंततः मिल गई. जो आज जमशेदपुर के नाम से जाना जाता है. इससे पहले यह साकची नामक एक आदिवासी गांव हुआ करता था. यहां की मिट्टी काली होने के कारण यहां पहला रेलवे-स्टेशन कालीमाटी के नाम से बना, जिसे बाद में बदलकर टाटानगर कर दिया गया.
जमशेदपुर को पहले साकची के नाम से जानते थे और 1918 में इस जगह का नाम साकची से बदलकर जमशेदपुर रखा गया और यह इसके संस्थापक जमशेदजी नुसेरवांजी टाटा को श्रद्धांजलि देते हुए किया गया. खनिज पदार्थों की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता और खड़काई तथा सुवर्णरेखा नदी के आसानी से उपलब्ध पानी, तथा कोलकाता से नजदीकी के कारण यहां आज के आधुनिक शहर का पहला बीज बोया गया. जमशेदपुर आज भारत के सबसे प्रगतिशील औद्योगिक नगरों में से एक है. टाटा घराने की कई कंपनियों के प्रॉडक्शन यूनिट जैसे टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टिस्कॉन, टिन प्लेट, टिमकन, ट्यूब डिवीजन, इत्यादि यहीं हैं.
यहां पर भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र आदित्यपुर है, जहां पर 1000 से भी ज्यादा छोटे और बड़े तबके के उद्योग हैं. टाटा स्टील के 50 साल होने पर जमशेदपुर वासी को तोहफे में जुबली पार्क दिया गया है. 225 एकड़ भूमि में फैले इस पार्क का उद्घाटन 1958 ई. में उस समय के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने किया था. वृंदावन गार्डन की तर्ज पर बने इस पार्क में गुलाब के लगभग एक हजार किस्‍म के पौधे लगे हुए हैं. इस पार्क में एक चिल्ड्रेन पार्क भी है. हाल में ही यहां एक एम्‍यूजमेंट पार्क का निर्माण किया गया है. एम्‍यूजमेन्‍ट पार्क में अनेक किस्‍म के झूले लगे हुए हैं. हरेक साल 3 मार्च को जमशेदजी नुसेरवांजी टाटा की याद में पूरे पार्क को बिजली के रंगीन बल्वों द्वारा बडे़ भव्‍य तरीके से सजाया जाता है.
अब आइये जानते है जे आर डी टाटा के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें-
जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा का जन्म २९ जुलाई १९०४ को हुआ. इनके पिता पारसी और माँ फ्रांसीसी थीं. जे आर डी ने फ्रांस, जापान और इंग्लॅण्ड में पढ़ाई की. १९२५ में बिना वेतन वाले एक ट्रेनी के रूप में टाटा एंड संस में काम शुरू किया. जे आर डी ने ही टेल्को (टाटा मोटर्स) की स्थापना की. टाटा मोटर्स विभिन्न प्रकार के ऑटोमोबाइल तो बनाती ही है. इसी कंपनी ने लखटकिया कार नैनो बनाकर आम लोगों को कार में चलने का सपना पूरा किया. २६ जुलाई १९३८ को सर नौरोजी सकटवाला के निधन के बाद उन्होंने टाटा ग्रुप की कमान सम्हाली. उस समय उनकी उम्र ३४ साल की थी. जे आर डी युवावस्था में कारों के शौक़ीन थे.  उनके पिता जमशेद जी टाटा ने २९२७ में ही फ्रांस से बुगाती कार मंगवाई थी. इस चार में तब न तो मडगार्ड था नहीं छत फिर भी उन्होंने इसी कार से मुंबई से पुणे की दूरी ढाई घंटे में पूरी की थी, जो उस समय का एक रिकॉर्ड था.
जे आर डी टाटा भारत के पहले कमर्शियल पायलट बने. १० फरवरी १९२९ को उनको पायलट का लाइसेंस मिला था. जे आर डी ने १९३२ में टाटा एयरलाइन्स की शुरुआत की जो कि बाद में १९४६ में एयर इंडिया, आज इंडियन एयर लाइन्स में तब्दील हो गया. पहली ब्यवसायिक उड़ान उन्होंने १५ अक्टूबर १९३२ को भरी जब वे सिंगल इंजन वाले हैवी लैंड पास मोथ हवाई जहाज को अहमदाबाद होते हुए करांची से मुंबई ले गए थे, उस उड़ान में यात्री नहीं बल्कि २५ किलो चिट्ठियाँ थी.
जे आर डी विमान उड़ाने में भी समय के ऐसे पाबंद थे कि उनकी विमान लैंडिंग से लोग अपनी घड़ी मिला लेते थे. टाटा एयर लाइन्स में भी यात्रियों की सुख सुविधा का पूरा ख्याल रखते थे. उद्योग जगत में प्रवेश करने के बाद उन्होंने कर्मचारियों को दी जानेवाली कई प्रकार की सुविधाओं की शुरुआत की जैसे कि ८ घंटे की कार्यावधि, भविष्य निधि, वेतन के साथ छुट्टी, मुफ्त चिकित्सा सुविधा, कामगार दुर्घटना क्षतिपूर्ति, आदि की सुविधा देने में टाटा ग्रुप अग्रणी रहा है. उन्होंने १९५६ में ही कार्मिक(Personnel) विभाग की स्थापना की जिसके तहत कर्मचारियों की कई तरह की समस्याओं का समाधान किया जाने लगा. उनका कहना था, “औद्योगिक विवाद की जड़ में अगर देखा जाय तो बहुत सारे विवादों का जन्म इसलिए हुआ, क्योंकि कामगारों की बात सुनी नहीं गयी.”
ईमानदारी की वे मिशाल थे और उनका कहना था काम छोटा से छोटा या बड़ा से बड़ा क्यों न हो पूरे मनोयोग और ईमानदारी के साथ की जानी चाहिए. इनफ़ोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन सुधा मूर्ति जे आर डी टाटा को अपना आदर्श मानती हैं और उनके साथ बिताये कई यादगार पल को अपनी आत्मकथा में साझा करती रहती हैं. टाटा ग्रुप कंपनियों में जुलाई का महीना ‘एथिक्स मंथ’ के रूप में मनाया जाता है जिनमे जे आर डी को आदर्श मानते हुए ईमानदार पहल के कई उदाहरण पेश किये जाते है साथ ही कंपनी के अलावा जमशेदपुर शहर में भी कई प्रकार का आयोजन किया जाता है जिसमे हर वर्ग के लोग अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हैं.    
जेआरडी टाटा को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. भारतीय वायु सेना ने उन्हें ग्रुप कैप्टन की मानद पद से सम्मानित किया था और बाद में उन्हें एयर कमोडोर पद पर पदोन्नत किया गया और फिर १ अप्रैल १९७४ को एयर वाइस मार्शल पद दिया गया. विमानन के लिए उनको कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया -मार्च १९७९ में टोनी जेनस पुरस्कार, सन् १९९५ में फेडरेशन ऐरोनौटिक इंटरनेशनल द्वारा गोल्ड एयर पदक,सन् १९८६ में कनाडा स्थित अन्तराष्ट्रीय नागर विमानन संगठन द्वारा एडवर्ड वार्नर पुरस्कार और सन् १९८८ में डैनियल गुग्नेइनम अवार्ड . सन् १९५५ में उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया. उनके नि: स्वार्थ मानवीय प्रयासों के लिए ,सन् १९९२ में जेआरडी टाटा को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया गया. भारत रत्न मिलने के बाद उनका कहना था – मैं यह नहीं चाहता कि भारत आर्थिक रूप से सुपर पॉवर बने बल्कि यह कि भारत खुशहाल देश हो. (I do not want India to be an economic superpower. I want India to be a happy country). 1992 में ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत में जनसंख्या नियंत्रण में अहम योगदान देने के लिए उन्हें यूनाइटेड नेशन पापुलेशन आवार्डसे सम्‍मानित किया.
२९ नवंबर १९९३ को गुर्दे में संक्रमण के कारण जिनेवा में ८९ वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. उनकी मृत्यु पर भारतीय संसद उनकी स्मृति में स्थगित कर दी गई थी. उनको पेरिस में पेरे लेचसे नामक कब्रिस्तान में दफनाया गया है.

जे आर डी टाटा जैसी महान हस्ती को हम जमशेदपुर वासी श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.