Saturday, 17 February 2018

हीरा है, सदा के लिए!

कृषि अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा ने हिसाब लगाया है कि अगर डेढ़ लाख तक का कर्ज़ा माफ कर दिया जाए तो इस 11000 करोड़ से 30 लाख किसान कर्ज़ मुक्त हो जाएंगे. डेढ़ लाख का कर्ज़ा है राम राज पर, जान देने लखनऊ आ गए, 11000 करोड़ का चूना लगाकर नीरव मोदी चले गए न्यूयार्क, उससे पहले गए स्वीटज़रलैंड जिसके बारे में कहा जाता है कि काला धन का घर है, वहीं के दावोस में जाता है और प्रधानमंत्री के साथ फोटो खींचा लेता है.
15
फरवरी के प्रेस कांफ्रेंस में रविशंकर प्रसाद ने कहा कि नीरव मोदी प्रधानमंत्री के साथ नहीं गए थे, बल्कि कंफिडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) के लोग लेकर गए. मगर फाइनेंशियल एक्सप्रेस की इस खबर के मुताबिक वित्त मंत्री अरुण जेटली उस साल 100 उद्योगपतियों को लेकर दावोस गए थे. कई नाम छपे हैं, एक नाम नीरव मोदी का भी है. 16 फरवरी 2018 टाइम्स ऑफ इंडिया के सी उन्नीकृष्णन ने खबर लिखी है कि 2016 के साल में नीरव मोदी को 48 करोड़ की पेनाल्टी देनी पड़ी थी क्योंकि दिसंबर 2014 में 1000 करोड़ का हीरा दिखा कर स्मगलिंग कर रहे थे. सवाल यह है कि स्मगलिंग का मामला चलता रहा फिर भी कैसे यह शख्स वित्त मंत्री के साथ 2016 में दावोस गया. सीबीआई जांच शुरू करने जा रही थी फिर यह नीरव मोदी प्रधानमंत्री मोदी के साथ फोटो फ्रेम में मौजूद है. प्रधानमंत्री के साथ भले न गए हों मगर 1000 करोड़ का माल चोरी से बाहर भेजने वाला वित्त मंत्री के साथ दावोस जाए क्या यह ठीक है ?
नीरव मोदी न्यूयार्क के होटल में हैं. दिल्ली में उनकी दुकान पर छापा पड़ा है. लेकिन उनकी दुकान तो दुनिया के कई देशों में है. क्या वहां भी छापे पड़े हैं? मामला कई कंपनियां बनाकर हीरे के कारोबार के नाम पर पैसा इधर से उधर करने का है. साबित कुछ नहीं होगा इसी का अफसोस है क्योंकि इस खबर को खत्म करने के लिए ज़रूर कोई बड़ा ईवेंट आ रहा होगा. गोदी मीडिया ने तुरंत खबर लिखना शुरू कर दिया कि 5000 करोड़ बरामद हो गए. माल ज़ब्त हुआ है, कीमत तय होने में कई महीने से लेकर साल लग जाते हैं. लेकिन यह भी पता चल रहा है कि छापे की टीम में जवाहरात के एक्सपर्ट भी हैं, जो साथ का साथ दाम भी बता दे रहे हैं. गोदी मीडिया ने लिख दिया कि पैसा बरामद हो गया. क्या वो कागज भी बरामद हुआ, क्या उन लोगों के नाम भी बरामद हो गए जिनके साथ मिलकर ये खेल खेला गया है. नीरव मोदी का पासपोर्ट रद्द हो गया है. इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि 1 जनवरी को कैसे अपने परिवार के साथ फरार हुआ. क्या 1 जनवरी तक जांच एजेंसी को बिल्कुल पता नहीं था कि नीरव मोदी के यहां छापे मारने की तैयारी है. 31 जनवरी की एफआईआर के पेज नंबर आठ पर साफ साफ लिखा है, जिसमें कहा गया है कि हम आपसे आग्रह करते हैं कि ऊपर दिए गए नामों के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया जाए ताकि वो देश छोड़ कर जा नहीं सके और कानून अपना काम नहीं कर पाए. तब 30 जनवरी को ही पासपोर्ट क्यों नहीं रद्द हुआ. इतने दिनों की छूट के बाद नीरव मोदी ने क्या-क्या हेराफेरी की, किस तरह से दस्तावेज गायब कर लिए होंगे, यह सब अब कभी पता नहीं चलेगा. जब 2जी घोटाले में सब बरी हो गए, जज सैनी ने कहा कि वे सुबह से शाम तक इंतज़ार करते रह गए मगर सीबीआई सबूत नहीं पेश कर सकी. अगुस्ता वेस्टलैंड हेलिकाप्टर का मामला याद होगा. इटली की अदालत में सीबीआई रिश्वतखोरी के सबूत पेश नहीं कर सकी. वहां की अदालत से आरोपी छूट गए और यहां किसी ने चर्चा नहीं की. ये है हमारी एजेंसियों का रिकार्ड. एफआईआर में सात लोगों के नाम हैं. नीरव मोदी, अमी नीरव मोदी, निशाल मोदी, मेहुल चीनुभाई चौकसी, गोकुलनाथ शेट्टी, मनोज हनुमंत खराट, डेपुटी मैनेजर पीएनबी और अन्य अज्ञात लोग, बैंक अधिकारी, पीएनबी.
आरोप है कि फर्जी तरीके से लेटर ऑफ अंडरटेकिंग जारी की गई जिसके पार्टनर नीरव मोदी, श्री निशाल मोदी, श्री अमी नीरव मोदी और श्री मेहुल चीनुभाई चौकसी हैं. 2011 से शुरू होने की बात कही जा रही है मगर एफआईआर में ही लिखा है कि 9.02.2017 को 44 लाख डॉलर और 43 लाख डॉलर से ज़्यादा की रकम की एलओयू जारी हुई. 10.2.2017 को 59 लाख डॉलर और 60 लाख डॉलर से ज़्यादा की रकम की एलओयू जारी हुई. 14.2.2017 को 58 लाख डॉलर से अधिक की रकम के दो एलओयू जारी हुए. जब यह बता ही रहे हैं कि 2011 से शुरू हुआ तो यह भी बताना चाहिए कि 2017 तक चलता रहा बल्कि 16 जनवरी 2018 तक चलाने की कोशिश हुई मगर भांडा फूट गया. इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि 2011 से 2017 के बीच डेढ़ सौ लेटर आफ अंडरटेकिंग जारी हुई है. यह सवाल महत्वपूर्ण हो सकता है कि घोटाला किसके राज में शुरू हुआ, क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उस पैसे का हिस्सा किस-किस के पास गया. इनके कौन-कौन करीबी हैं. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार  17 बैंक इस घोटाले की चपेट में हैं. 11,300 करोड़ के अलावा 3000 करोड़ का घोटाला हुआ है. चर्चा नीरव मोदी की ज़्यादा हो रही है मगर इस खेल का बड़ा खिलाड़ी मेहुल चौकसी भी है.
प्रधानमंत्री जिस हमारे मेहुल भाई को संबोधित कर रहे हैं ये वही मेहुल भाई हैं जो नीरव मोदी के पार्टनर हैं. इन दोनों के खिलाफ मुंबई पुलिस कमिश्नर से लेकर बंगुलुरु पुलिस कमिश्नर से लेकर वित्त मंत्रालय की सभी एजेंसियों के पास कई बार शिकायत भेजी जा चुकी थी. यह शिकायत 2013 से की जा रही थी. फिर भी यह शख्स 2015 में प्रधानमंत्री के सरकारी कार्यक्रम में उन्हीं के सामने मौजूद है. पांच लोगों ने अगर जान जोखिम में डालकर इस मामले की शिकायत न की होती तो आज इस घोटाले का इतिहास आसानी से दबा दिया जाता. ये पांच लोग वो हैं जो हर एजेंसी को लिख रहे थे, धमकियां सुन रहे थे, जिंदगी दांव पर लगाकर शिकायत कर रहे थे. अगर तब सुन लिया गया होता तो पंजाब नेशनल बैंक को 11,300 करोड़ का नुकसान न उठाना पड़ता.
शिखर जैन, वैभव खुरानिया. हरि प्रसाद, दिग्विजय सिंह जडेजा और संतोश श्रीवास्तव. इन लोगों ने खूब पत्र लिखे मगर हर जगह से निराशा हाथ लगी. बाद में खुद भी हताश होने लगे कि अब कुछ नहीं होगा. पंजाब नेशनल बैंक ने 16 जनवरी को नहीं पकड़ा होता तो यह पता ही नहीं चलता कि कुछ लोग गीतांजली कंपनी से इस्तीफा देकर इसकी लड़ाई लड़ रहे हैं. इस मामले में पहला पत्र 4 मई 2015 को दिल्ली स्थित SIFO यानी सीरीयस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन आर्गेनाइशेन को लिखा गया. 6 मई को मुंबई पुलिस कमिश्नर और सारे ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर को लिखा गया. इसकी कॉपी वित्त मंत्रालय, कॉरपोरेट मंत्रालय, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सीबीआई और आर्थिक अपराध शाखा दिल्ली को भी भेजी गई. 26 जुलाई 2016 को पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय को शिकायत की कॉपी भेजी गई. पीएमओ ने तुरंत ही इस कॉपी को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी को पत्र भेज दिया. रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी कोरपोरेट मामले के मंत्रालय के तहत आता है. 29 जुलाई 2016 को इन लोगों ने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी को फिर पत्र लिखा. दो महीने बाद रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी का जवाब आता है कि मामला बंद हो गया है. बिना किसी शिकायतकर्ता से बात किए रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी ने मामले को कैसे बंद कर दिया.
कब शुरू हुआ यह महत्वपूर्ण है तो यह भी महत्वपूर्ण होना चाहिए कि कब तक चलता रहा. आखिर फरवरी 2017 में आठ जाली लेटर ऑफ अंडरटेकिंग कैसे मिल गया नीरव मोदी को. प्रदर्शनी में राहुल का जाना महत्वपूर्ण है तो नीरव मोदी का प्रधानमंत्री मोदी के साथ तस्वीर खिंचाना भी महत्वपूर्ण होना चाहिए. अगर कांग्रेस बराबर बीजेपी साबित हो गया तो इसका मतलब घोटाला हुआ ही नहीं था.
प्रकाश झावड़ेकर ने एक बात कही. स्वच्छ बैंक मिशन की. इसके अनुसार 3 अक्तूबर को इस मिशन के तहत एक दिन के भीतर ब्रोकर संस्थाओं, बैंक और कंपनियों को बताना था कि उनके पास कितना लोन बाकी है. क्या सबने घोषणा की या फिर इस मिशन को बीच में ही रोक दिया गया क्योंकि इससे सबका हिसाब किताब बाहर आ जाता और पोल खुल जाता. क्या 3 अक्तबूर 2017 को एक दिन के भीतर सभी कंपनियों और बैंकों ने अपनी देनदारी यानी बकाए की घोषणा की? इस घोटाले के बाद पंजाब नेशनल बैंक का शेयर 52 सप्ताह में सबसे नीचे चला गया है. 8 हज़ार करोड़ से ज़्यादा इसके शेयरधारकों को नुकसान हो चुका है.
उपर्युक्त सारी जानकारी मीडिया रिपोर्ट पर आधारित है. अब सवाल यही है कि नीरव मोदी का कुछ होगा? या वे भी ललित मोदी और माल्या जैसे लोगों की तरह कानून को ठेंगा दिखता रहेगा. आप और हम अगर किसी भी बैंक से लोन लेने जाते हैं तो कितने प्रकार के दस्तावेज जमा करने होते हैं और बैंक हमसे वसूल भी लेता है. जो नहीं दे पाते वे आत्महत्या कर लेते हैं और बड़े लोग किस तरह सबकी आँखों में धूल झोंककर गायब हो जाते हैं. कल तक मशहूर लोग अचानक गायब हो जाते हैं और जांच एजेंसियां उन्हें ढूढ़ने का नाटक करती रहती है. कुछ छोटे मोटे लोग फंस जाते हैं और सारा खामियाजा उन्हें ही भुगतना पड़ता है जैसे कि ख़बरें हैं कुछ गिरफ्तारियां हुई है और आगे भी जारी रहेगी. आरोप प्रत्यारोप चलता रहेगा उसके बाद कुछ दिनों बाद मामला ठंढा हो जाएगा. सब पर्याप्त सबूत के अभाव में बरी हो जायेंगे और बैंक अतिरक्त शुल्क लगाकर आम आदमी से वसूल कर अपनी भरपाई करेगा या सरकार से सहायता प्राप्त कर लेगा. हमें क्या चाहिए? जय श्री राम और भारत माता की जय! वन्दे मातरम ! जय हिन्द!

– जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर. 

Saturday, 10 February 2018

राफेल लड़ाकू विमान खरीद का मामला

भारत फ्रांस से 36 रफ़ाल लड़ाकू विमान ख़रीद रहा है. क्या भारत ने एक विमान की कीमत टेंडर में कोट की गई कीमत से बहुत ज़्यादा चुकाई है? इसे लेकर बहस हो रही है. मेरी अपनी कोई समझ नहीं है न जानकारी है लेकिन रक्षा विशेषज्ञ अजय शुक्ला और रक्षा की रिपोर्टिंग करने वाले शानदार रिपोर्टर मनु पबी की रिपोर्ट के आधार पर ही इस आलेख का सार है.
कांग्रेस पार्टी आरोप लगा रही है कि प्रधानमंत्री ने फ्रांस से रफाल लड़ाकू विमान की ख़रीद को लेकर जो क़रार किया है, उसमें घपला हुआ है. इस घपले में ख़ुद प्रधानमंत्री शामिल हैं. पिछले साल जब कांग्रेस ने मामला उठाया था तब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि हम सब कुछ बताने को तैयार हैं, कोई घोटाला नहीं हुआ है. अब वे कह रही हैं कि दोनों देशों के बीच करार की शर्तों के अनुसार हम जानकारी नहीं दे सकते. मगर कीमत बताने में क्या दिक्कत है? कांग्रेस का दावा है कि उसके कार्यकाल यानी 2012 में जब डील हो रही थी तब एक रफाल की कीमत 526 करोड़ आ रही थी. एनडीए सरकार के समय जो डील हुई है उसके अनुसार उसी रफाल की कीमत 1640 करोड़ दी जा रही है.
मनु पबी की रिपोर्ट- एक दिसंबर 2017 को दि प्रिंट में मनु ने लिखा कि 36 रफाल लड़ाकू विमान ख़रीदने से पहले सरकार ने उससे सस्ता और सक्षम लड़ाकू विमान ख़रीदने के विकल्प को नज़रअंदाज़ कर दिया. एक यूरोफाइटर टाइफून 453 करोड़ में ही आ जाता. ब्रिटेन, इटली और जर्मनी ने सरकार से कहा था कि वे विमान के साथ पूरी टेक्नालॉजी भी दे देंगे. 2012 में रफाल और यूरोफाइटर दोनों को भारतीय ज़रूरतों के अनुकूल पाया गया था. यूपीए ने जो फ्रांस के साथ क़रार किया था उसमें देरी हो रही थी. मोदी सरकार ने उसे रद्द कर दिया. जब ब्रिटेन, जर्मनी और इटली को पता चला तो उन्होंने 20 प्रतिशत कम दाम पर लड़ाकू विमान देने की पेशकश की मगर सरकार ने अनदेखा कर दिया. सरकार के पास इनका ऑफर जुलाई 2014 से लेकर 2015 के आख़िर तक पड़ा रहा.
अजय शुक्ला की रिपोर्ट- अजय शुक्ला ने लिखा कि भारतीय वायु सेना इस सदी की शुरुआत से ही रूसी दौर के महंगे विमानों की जगह सस्ते और सक्षम विमानों की तलाश कर रही है. 10 अप्रैल 2015 को जब प्रधानमंत्री मोदी ने ऐलान किया कि भारत दसाल्त से 36 रफाल लड़ाकू विमान ख़रीदेगा तब रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने दूरदर्शन पर कहा कि यह एक रणनीतिक ख़रीद है. इसे प्रतिस्पर्धी टेंडर के ज़रिए नहीं किया जाना चाहिए था यानी बिना टेंडर के ही ख़रीदा जाना उचित है. कई विशेषज्ञों की निगाह में रफ़ाल ख़रीदने का कोई ठोस कारण नहीं दिखता है क्योंकि उसके पास पहले से सात प्रकार के लड़ाकू विमान हैं. उनके रखरखाव का सिस्टम बना हुआ है, रफाल के आने से काफी जटिलता पैदा हो जाएगी.
रफाल की ख़रीद को इसलिए जायज़ ठहराया जा रहा है कि इस पर परमाणु हथियार लोड किया जा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि ये दूसरे विमानों के साथ भी हो सकता है. कहने का मतलब है कि भारत को विचार करना चाहिए कि इतना महंगा विमान वह क्यों ख़रीद रहा है. यही काम तो सुखोई 30MKI भी कर सकता है. और अगर इतने महंगे विमान की ख़रीद इसलिए हो रही है क्योंकि उसकी परमाणु हथियार ढोने की क्षमता दूसरों से बेहतर है तो सरकार ने पब्लिक में क्यों नहीं कहा. 2030-35 तक जगुआर और मिराज 2000 को अपग्रेड कर दिया जाएगा जो हवा में परमाणु हथियार लेकर मार कर सकेंगे तो फिर रफाल की ज़रूरत क्या है. अजय शुक्ला कहते हैं कि मिराज 2000 भी फ्रांस के दसाल्त की है. वो अब इसका उत्पादन बंद कर रहा है. कई लोग इस मत के हैं वह अपनी यह टेक्नालॉजी भारत को दें, जिसके आधार पर पहले से बेहतर मिराज 2000 तैयार किया जा सके क्योंकि कारगिल युद्ध में मिराज 2000 के प्रदर्शन से वायुसेना संतुष्ठ थी. लेकिन उस वक्त जार्ज फर्नांडिस बिना प्रतिस्पर्धी टेंडर के सीधे एक कंपनी से करार करने से पीछे हट गए क्योंकि तब तक तहलका का स्टिंग ऑपरेशन हो चुका था. 15 साल बाद वही हुआ जो जार्ज नहीं कर सके. सरकार ने सिंगल वेंडर से रफ़ाल ख़रीदने का फ़ैसला कर लिया. क्यों भाई ?
रफाल ख़रीदने के बाद भी वायु सेना की ज़रूरत पूरी नहीं हुई है, तभी तो 144 सिंगल इंजन लड़ाकू विमानों के लिए टेंडर जारी किए जा रहे हैं. इस डील से मेक इन इंडिया की शर्त भी समाप्त कर दी गई है. रफाल से भी सस्ते और चार विमान हैं जिन पर विचार किया जा सकता था. दुनिया के हर वायु सेना के बेड़े में F-16 SUPER VIPER, F/A-18E, F SUPER HORNET 0  शान समझे जाते हैं. भारत ने इन पर विचार करना मुनासिब नहीं समझा. जिसकी ज़रूरत नहीं थी, उसे ख़रीद लिया.
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार मूल टेंडर में दिए गए दाम से 58,000 करोड़ ज़्यादा दे रही है. चूंकि सरकार ने अपनी तरफ से कोई डेटा नहीं दिया है इसलिए बाज़ार में जो उपलब्ध है उसके आधार पर इन आरोपों की जांच की जा सकती है. निर्मला सीतारमण ने तो कहा था कि रफाल के दाम की जानकारी पब्लिक कर दी जाएगी लेकिन नहीं की गयी. 2015 में जो डील साइन हुई है उसका एक आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध है. 36 रफाल के लिए भारत 7.8 अरब यूरो देगा. डील के तुरंत बाद रक्षा मंत्री ने कुछ संवाददाताओं के साथ ऑफ रिकार्ड ब्रीफिंग में कहा था कि एक रफाल की कीमत 686 करोड़ है. अगर ऐसा है तो 36 रफाल लड़ाकू विमान की कीमत होती है 3.3 अरब यूरो केवल विमान की कीमत. इसके अलावा भारत ने अपनी ज़रूरतों के हिसाब से और भी कीमत अदा की जो 7.85 अरब यूरो हो जाती है. एक हैं कि एयरक्राफ्ट की कीमत में अतिरिक्त लागत कितनी है? मतलब एक दाम तो हुआ सिर्फ जहाज़ का, बाकी दाम हुए उसके रखरखाव, टेक्नालॉजी हस्तांतरण, हथियारों से लैस करने के. कई जानकारों का कहना है कि भारत की ज़रूरतों के हिसाब से बदलाव की कीमत जहाज़ की मूल कीमत में शामिल होनी चाहिए न कि अलग से अदा की जाए. इसके कारण एक जहाज़ की कीमत हो जाती 1,063 करोड़. 13 अप्रैल 2015 को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने दूरदर्शन से कहा था कि रफाल काफी महंगा है. अगर आप टॉप एंड मॉडल लें तो 126 जहाज़ की कीमत 90,000 करोड़ पहुंच जाती है. इस हिसाब से तो एक जहाज़ की कीमत होती है 714 करोड़. यानी जो भारत चुका रहा है उससे भी कम.
रफाल ने जो MMRC टेंडर में दाम कोट किया था उसी से तुलना करने पर सही दाम का अंदाज़ा मिलेगा. फ्रांस की संसद यानी फ्रेंच सीनेट समय-समय पर रफाल की कीमत जारी करती है. 2013-14 की सूची के अनुसार एक रफाल की कीमत है 566 करोड़. इसके अलावा 527 करोड़ और 605 करोड़ के भी मॉडल हैं. फ्रांस की संसद जो दाम बता रही है वो तो काफी कम है. भारत इससे ज़्यादा दे रहा है. फ्रांस ने इनकार किया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने रफाल विमान के लिए अधिक दाम पर सौदा किया है. यह ख़बर आधिकारिक चैनल से नहीं आई बल्कि ख़बरों में फ्रेंच राजनयिक के सूत्रों का हवाला दिया गया है. ज़ाहिर है यह हवाला प्लांट ज़्यादा लगता है.
प्रशांत भूषण सवाल कर रहे हैं कि 28 मार्च 2015 को अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस पंजीकृत होती है. दो हफ्ते के भीतर उसे मोदी 600 करोड़ में एक रफाल विमान की पुरानी डील को रद्द कर नई डील करते हैं कि 1500 करोड़ में एक रफाल विमान ख़रीदेंगे. हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड को हटाकर रिलायंस डिफेंस कंपनी को इस डील का साझीदार बना दिया जाता है. इसमें घोटाला है.
रक्षा सौदों को लेकर उठने वाले सवाल कभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते हैं. आज तक हम बोफोर्स की जांच में समय बर्बाद कर रहे हैं और दुनिया को बरगला रहे हैं. दो हफ्ते पुरानी कंपनी को हज़ारों करोड़ की डिफेंस डील मिल जाए, ये सिर्फ और सिर्फ उसी दौर में हो सकता है जब देश हिन्दू-मुस्लिम और छद्म राष्ट्रवाद में डूबा हुआ है, वरना जनता को उल्लू बनाने का कोई चांस ही नहीं था.
इसी नौ जनवरी को इटली से एक ख़बर आई जिसे लेकर किसी ने इस पर दमदार चर्चा नहीं की. सीएनएन आईबीएन के भूपेंद्र चौबे को छोड़कर. जबकि अगुस्ता वेस्टलैंड का मामला आता है तो गोदी मीडिया ज़बरदस्त आक्रामक हो जाता है क्योंकि इससे विपक्ष को घेरने का मौका बनता है लेकिन जब सरकार इस केस में पिट गई तो चुप हो गया. नौ जनवरी को इटली की अदालत ने अगुस्ता वेस्टलैंड वीआईपी हेलिकाप्टर ख़रीद मामले में दो मुख्य आरोपियों GIUSEPPE ORSI और BRUNO SPAGNOLINI को बरी कर दिया. कहा कि इनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं हैं. कहा गया कि इस बात के कोई सबूत नहीं दिए गए कि वायु सेना के पूर्व प्रमुख त्यागी ने हेलिकाप्टर कंपनी से रिश्वत ली थी. इसके बाद भी सीबीआई कहती है कि उनकी जांच पर कोई असर नहीं पड़ेगा. जबकि वह इटली की अदालत में सबूत पेश नहीं कर सकी. सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी कोर्ट में गए थे. इटली के जज ने वही कहा जो टू जी मामले में जज ओपी सैनी ने कहा कि हम इंतज़ार करते मगर सीबीआई कोई सबूत पेश नहीं कर पाई. टू जी मामले में भी सबूत पेश नहीं कर किसे बचाया गया है, किस-किस से पैसा खाया गया है, ये कौन जानता है. अब सवाल विपक्ष में बैठी कांग्रेस का है. अन्य विपक्षी दल खामोश से ही हैं. क्यों खामोश हैं उनकी वे जाने. मीडिया का मजबूत वर्ग यानी गुणगान करनेवाला वर्ग भी खामोश है. जनता क्या करेगी? यह उस बात पर निर्भर करता है कि कांग्रेस इसे कितना भुना पाती है, राहुल गाँधी के सहारे? उधर सीमा पर हलचल है और देश में खलबली.

-    जवाहर लाल सिंह, विभिन्न स्रोतों से जानकारी के आधार पर.