Sunday, 3 December 2017

विश्व विकलांग(दिव्यांग) दिवस

हर साल 3 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकलांग व्यक्तियों का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने की शुरुआत हुई थी और 1992 से संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय रीति-रिवीज़ के रुप में प्रचारित किया जा रहा है। विकलांगों के प्रति सामाजिक कलंक को मिटाने और उनके जीवन के तौर-तरीकों को और बेहतर बनाने के लिये उनके वास्तविक जीवन में बहुत सारी सहायता को लागू करने के द्वारा तथा उनको बढ़ावा देने के लिये साथ ही विकलांग लोगों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देने के लिये इसे सालाना मनाने के लिये इस दिन को खास महत्व दिया जाता है। 1992 से, इसे पूरी दुनिया में ढ़ेर सारी सफलता के साथ इस वर्ष तक हर साल से लगातार मनाया जा रहा है।
वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा के द्वारा विकलांगजनों के अंतरराष्ट्रीय वर्षके रुप में वर्ष 1981 को घोषित किया गया था। अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर विकलांगजनों के लिये पुनरुद्धार, रोकथाम, प्रचार और बराबरी के मौकों पर जोर देने के लिये योजना बनायी गयी थी। समाज में उनकी बराबरी के विकास के लिये विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिये, सामान्य नागरिकों की तरह ही उनके सेहत पर भी ध्यान देने के लिये और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिये पूर्ण सहभागिता और समानताका थीम विकलांग व्यक्तियों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के उत्सव के लिये निर्धारित किया गया था। सरकारी और दूसरे संगठनों के लिये निर्धारित समय-सीमा प्रस्ताव के लिये संयुक्त राष्ट्र आम सभा के द्वारा विकलांग व्यक्तियों के संयुक्त राष्ट्र दशकके रुप में वर्ष 1983 से 1992 को घोषित किया गया था जिससे वो सभी अनुशंसित क्रियाकलापों को ठीक ढंग से लागू कर सकें।
विश्व विकलांग दिवस कैसे मनाया जाता है
उनकी सहायता और नैतिकता को बढ़ाने के लिये साथ ही साथ विकलांगजनों के लिये बराबरी के अधिकारों को सक्रियता से प्रसारित करने के लिये उत्सव के लिये पूरी दुनिया से लोग उत्साहपूर्वक योगदान देते हैं। कला प्रदर्शनी के आयोजन के द्वारा इस महान उत्सव को मनाया जाता है जो उनकी क्षमताओं को दिखाने के लिये विकलांग लोगों के द्वारा बनायी गयी कलाकृतियों को बढ़ावा देता है। समाज में विकलांगजनों की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में जागरुकता को बढ़ाने के साथ ही विकलांग लोगों की कठिनाईयों की ओर लोगों का ध्यान खींचने के लिये विरोध क्रियाओं में सामान्य लोग भी शामिल होते हैं।
विश्व विकलांग दिवस को मनाने का लक्ष्य
  • इस उत्सव को मनाने का महत्वपूर्ण लक्ष्य विकलांगजनों के अक्षमता के मुद्दे की ओर लोगों की जागरुकता और समझ को बढ़ाना है।
  • समाज में उनके आत्म-सम्मान, लोक-कल्याण और सुरक्षा की प्राप्ति के लिये विकलांगजनों की सहायता करना।
  • जीवन के सभी पहलुओं में विकलांगजनों के सभी मुद्दे को बताना।
  • इस बात का विश्लेषण करें कि सरकारी संगठन द्वारा सभी नियम और नियामकों का सही से पालन हो रहा है य नहीं।
  • समाज में उनकी भूमिका को बढ़ावा देना और गरीबी घटाना, बराबरी का मौका प्रदान कराना, उचित पुनर्सुधार के साथ उन्हें सहायता देना।
  • उनके स्वास्थ्य, सेहत, शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा पर ध्यान केन्द्रित करना।
विश्व विकलांग दिवस को मनाना क्यों आवश्यक है
ज्यादातर लोग ये भी नहीं जानते कि उनके घर के आस-पास समाज में कितने लोग विकलांग हैं। समाज में उन्हें बराबर का अधिकार मिल रहा है कि नहीं। अच्छी सेहत और सम्मान पाने के लिये तथा जीवन में आगे बढ़ने के लिये उन्हें सामान्य लोगों से कुछ सहायता की ज़रुरत है, । लेकिन, आमतौर पर समाज में लोग उनकी सभी ज़रुरतों को नहीं जानते हैं। आँकड़ों के अनुसार, ऐसा पाया गया है कि, लगभग पूरी दुनिया के 15% लोग विकलांग हैं। इसलिये, विकलांगजनों की वास्तविक स्थिति के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिये इस उत्सव को मनाना बहुत आवश्यक है। विकलांगजन विश्व की सबसे बड़ी अल्पसंख्यकोंके तहत आते हैं और उनके लिये उचित संसाधनों और अधिकारों की कमी के कारण जीवन के सभी पहलुओं में ढ़ेर सारी बाधाओं का सामना करते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 दिसंबर 2015 को अपने रेडियो संबोधन मन की बातमें कहा था कि शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के पास एक दिव्य क्षमताहै और उनके लिए विकलांगशब्द की जगह दिव्यांगशब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए और अब दिव्यांग शब्द का इस्तेमाल हो रहा है हालाँकि इससे कोई खास अंतर नहीं पड़ता. हमारे दिमाग के अन्दर की मानसिकता बदलनी चाहिए.
दिव्यांग कानून
इसमें नि:शक्तजनों से भेदभाव किए जाने पर दो साल तक की कैद और अधिकतम पांच लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है. दिव्यांगों की श्रेणी में तेजाब हमले के पीड़ितों को भी शामिल किया गया है. नि:शक्त व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संधि और उसके आनुषंगिक विषयों को प्रभावी बनाने वाला नि:शक्त व्यक्ति अधिकार विधयेक 2014 काफी व्यापक है और इसके तहत दिव्यांगों की श्रेणियों को सात से बढ़ाकर 21 कर दिया गया है. इन 21 श्रेणी में तेजाब हमले के पीड़ितों और पार्किंसन के रोगियों को भी शामिल किया गया है. देश की आबादी के 2.2 प्रतिशत लोग दिव्यांग हैं. अभी तक कानून में इनके लिए 3 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था जिसे बढ़ाकर 4 प्रतिशत किया गया है.
हमारे बीच कुछ जानी मानी हस्तियाँ हैं जो दिव्यांग के रूप में अपने अपने क्षेत्र में नाम कमा रहे हैं. प्रख्यात संगीतकार और गायक स्वर्गीय रविन्द्र जैन, नृत्यांगना सोनल मान सिंह, नृत्यांगना सुधाचंद्रन, एवेरेस्ट पर चादाह्नेवाली पहली दियंग महिला अरुणिमा सिन्हा का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है. इन्होने अपने आपको सिद्ध किया है. ऐसी अनेक जानी मानी हस्तियाँ हैं जिन्होंने अपनी दिव्यांगता को सिद्ध किया है.   
अंत में हमारा कहना यही है कि किसी भी अशक्त दिव्यांग लोगों के साथ भेदभाव ना करें और यथसंभव उनकी मदद करें उन्हें काबिल बनायें ताकि वे अपने आपको समर्थ महसूस कर सकें. ईश्वर ने किसी को भी पूर्ण नहीं बनाया है. हर एक में कुछ कमियां अवश्य होती है इसलिए उन कमियों को कैसे दूर किया जाय और अगर उनमे कुछ विशेष क्षमता है तो कैसे उसे विकसित किया जाय यही प्रयास हर स्तर पर किया जाय. उनका मजाक उड़ाकर उन्हें हतोत्साहित तो कदापि न करें. फूल के साथ काँटों का मेल, सुख के साथ दुःख का मेल, दिन के साथ रात्रि का मेल, धुप के साथ छांव का मेल, सफ़ेद के साथ स्याह का मेल यही तो परमात्मा की यथार्थ रचना है. फिर हम अपने ही समाज के एक अशक्त व्यक्ति की शक्ति को कैसे नकार सकते हैं.
१९७२ में शक्ति सामंत ने अनुराग फिल्म बनांई थी, जिसमे मौसमी चटर्जी ने एक अंधी लड़की का किरदार निभाया था. बाद में उसे फिल्म के ही एक पात्र द्वारा नेत्रदान कर उसकी आँखों को रोशनी प्रदान के गयी थी. यह फिल्म काफी सराही गयी थी और उसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था. फिल्म के निर्माता शक्ति समान्त का कहना था - अगर इस फिल्म को देखकर एक व्यक्ति भी किसी को अपना नेत्रदान करने की प्रेरणा पाता है तो उन्के फिल्म बनाने का मकसद पूरा हो जायेगा. आज अनेकों संस्थाएं नेत्रदान के लिए काम कर रही है और काफी लोग नेत्रदान कर भी रहे हैं. कई सरकारी और गैर सरकारी संगठन अशक्त लोगों के लिए काम कर रहे हैं. सरकारें उन्हें यथासंभव सहायता भी देती है. यह सहायता राशि का सही इस्तेमाल हो यह सुनिश्चित की जानी चाहिए.
जरूरत है, स्वस्थ मानसिकता की जो किसी भी मानव मात्र से भेदभाव न करे. जयहिंद! जय दिव्यांग

 - जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

Saturday, 18 November 2017

डॉ अजय कुमार- एक बहुआयामी व्यक्तित्व

कांग्रेस की झारखंड इकाई का नया अध्यक्ष डॉ अजय कुमार को बनाया गया है. अजय कुमार इससे पहले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता की भूमिका में थे. राजनीति में एक दशक भी नहीं पूरा करने वाले अजय कुमार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने झारखंड कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में बड़ी जिम्मेवारी सौंपी है, जहां उन्हें पार्टी को राज्य में सक्रिय क्षेत्रीय दलों के सहयोगी दल की भूमिका से विपक्ष की राजनीति के केंद्र में लाने के लिए जूझना होगा.
अजय कुमार ने यूं तो अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा से शुरू की थी और इसके टिकट पर जमशेदपुर से 2011 में सांसद चुने गये थे. बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गये. कांग्रेस में सक्रिय रहते हुए उन्होंने भाजपा में जाने की अटकलों पर अपने अंदाज में यह बयान देकर विराम लगाया था कि उसका डीएनए मेरे डीएनए से मिलता नहीं है, इसलिए ऐसा कभी हो नहीं सकता.
अजय कुमार 2010 से 2014 तक झाविमो में और फिर 2014 से कांग्रेस में सक्रिय हैं. 55 वर्षीय अजय कुमार का जन्म कर्नाटक के मंगलोर में अजय कुमार भंडारी के रूप में हुआ था और उन्होंने हैदराबाद से स्कूलिंग की और पुड्डूचेरी के जवाहर लाल इंस्टीट्यूट से 1985 में मेडिकल की पढाई पूरी की. अगले ही साल 1986 में वे आइपीएस के लिए चुने गये. अजय कुमार के एस भंडारी एवं श्रीमती वत्सला के पुत्र हैं.
एमबीबीएस डॉक्टर अजय कुमार भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी भी रह चुके हैं और आइपीएस अधिकारी के रूप में वह बिहार एवं झारखंड में काम कर चुके हैं. वह 1994 से 1996 तक जमशेदपुर के एसपी के पद पर भी कार्य कर चुके हैं.
कर्नाटक के मूलवासी अजय कुमार ने आइपीएस से इस्तीफा देने के बाद कुछ समय तक कॉरपोरेट जगत में काम किया और फिर राजनीति में शामिल हुए. वह बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाली झाविमो के टिकट पर 2011 में जमशेदपुर से लोस के लिए चुने गये थे.
एक आइपीएस के रूप में अजय कुमार ने शानदार कामकाज किया. एकीकृत बिहार के दो प्रमुख शहरों पटना एवं जमशेदपुर में प्रमुख रूप से वे तैनात रहे और अपराध को जबरदस्त ढंग से काबू में किया. जमशेदपुर में जब अपराध काफी बढ़ गया था तब टाटा स्टील के एमडी जेजे ईरानी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से इसे नियंत्रित करने के लिए एक प्रभावशाली अधिकारी की तैनाती का आग्रह किया. लालू ने उनके आग्रह पर पटना के सिटी एसपी अजय कुमार को जमशेदपुर का एसपी बनाकर भेजा और कम ही समय में उन्होंने वहां अपराध को नियंत्रित कर लिया. 

एसपी के रूप में अजय कुमार के शानदार कामकाज का असर था कि 2011 के जमशेदपुर उपचुनाव में वे डेढ़ लाख से अधिक वोटों से चुनाव जीत गये. जमशेदपुर उनके जीवन में खास जगह रखता है. हालांकि 2014 के आमचुनाव में मोदी लहर में वे कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जमशेदपुर से हार गये, लेकिन पार्टी हाईकमान को उनकी संभावनाओं का अहसास था. वे पार्टी के लिए शानदार व तार्किक ढंग से अपनी बात रखने वाले चेहरे के रूप में उभरे और सोनिया-राहुल का उन पर विश्वास बढ़ता गया. अब अजय कुमार को एक डॉक्टर के रूप में पार्टी संगठन की सर्जरी करनी होगी और आइपीएस के रूप में विरोधी दलों के खिलाफ आक्रामक तेवर अख्तियार करना होगा.
जमशेदपुर में एसपी रहे अजय कुमार ने यहां आने के बाद जैसे ही अपराधियों के एनकाउंटर करने शुरू किए, उनमें दहशत फैल गई. उस समय का बड़ा डॉन माना जाने वाला हिदायत खान शहर छोड़ कर भाग गया. गरम लाला गिरोह से उसकी खूनी अदावत चलती थी. दोनों गिरोह में अक्सर गैंगवार होते रहता था. अजय कुमार के दहशत के आगे गरम लाला गिरोह के भी कई सदस्य अंडरग्राउंड हो गए. कईयों को अजय कुमार ने एनकाउंटर में मार गिराया. जानकारों के मुताबिक एसपी अजय ने लगभग 15 से अधिक एनकाउंटर किए. उसके बाद उनके ऊपर भी राजनीतिक दबाव पड़ा और उन्होंने पुलिस की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया. बताया जाता है कि अपने सब ऑर्डिनेट्स की ड्यूटी और ईमानदारी को लेकर अजय कुमार का बिहार के तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद से विवाद हो गया था, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया.
आईपीएस की नौकरी से इस्तीफा देकर वे टाटा मोटर्स में सीनियर एक्जीक्यूटिव बने. फिर पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा प्रजातांत्रिक में शामिल हो गए.
2011 में झाविमो प्रजातांत्रिक के टिकट पर ही जमशेदपुर से लोकसभा का उपचुनाव लड़े और भाजपा के दिनेशानंद गोस्वामी को डेढ़ लाख से अधिक वोटों से हरा दिया. 23 अगस्त 2014 को कांग्रेस में शामिल हो गए. इसके बाद पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाए गए.
हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में अजय कुमार को भाजपा के विद्युत वरण महतो ने मोदी लहर में लगभग एक लाख वोटों के अंतर से हरा दिया.

अजय कुमार पटना के सिटी एसपी रह चुके हैं. पटना में भी उनके नाम का बदमाशों में खौफ था. इसी कारण उन्हें जमशेदपुर भेजा गया. उन दिनों जमशेदपुर में अपराधियों के कई गैंग बन गए थे. सरेआम अपराधियों ने मर्डर, रंगदारी और अपहरण जैसी घटनाओं को अंजाम देना शुरू कर दिया था. आम लोग दहशत में थे. कारोबारियों का घर से निकलना मुश्किल हो गया था. इसी कारण तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद से टाटा स्टील के एमडी ने विशेष आग्रह किया. इसके बाद अजय कुमार ने दो वर्ष में बतौर जमशेदपुर एसपी वहां कानून का राज लाया. उनके डर से अधिकतर अपराधियों ने शहर छोड़ दिया. जो रह गए वे एनकाउंटर में मारे गए.
एसपी रहते घोड़े पर निकलते थे, कई बच्चों का नाम रखा गया अजय
अजय कुमार घोड़े पर भी निकला करते थे. देर रात तक वो सड़कों पर होते. उनका नाम सुनते ही अपराधियों की रूह कांपने लगती थी. कहा जाता है कि उस समय जितने बेटे पैदा हुए उनमें से अधिकतर के माता-पिता ने उनका नाम अजय रखा. जमशेदपुर के लोग आज भी अजय कुमार को बड़ी ही इज्जत के साथ याद करते हैं. कई लोगों के लिए आज भी वो हीरो हैं.
पुलिस मेडल पाने वाले यंगेस्ट आईपीएस आफिसर
अजय कुमार प्रेसिडेंट पुलिस मेडल पाने वाले यंगेस्ट आईपीएस आफिसर रहे हैं. उन्हें प्रोबेशन के दौरान ही गैलेंट्री के लिए यह अवार्ड मिला था. इसके अलावा अजय कुमार संतोष एंड डूरंड ट्रॉफी के नेशनल लेवल के प्लेयर रह चुके हैं. उनके पास पर्सनल पायलट लाइसेंस भी है.
अजय ने 1985 में पुडुचेरी के जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च से एमबीबीएस की डिग्री ली है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि डॉ. अजय कुमार बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं. सबसे बढ़कर उनकी छवि एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर की रही है. प्रखर व्यक्तित्व के कारण वे एक हीरो जैसे दीखते थे. उस समय हमलोग सुनते थे - वे प्रति दिन सुबह जे. आर. डी. स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स में व्यायाम करने आते थे और बड़े बड़े गुंडों के हाथ में पिस्तौल थमाकर उसका एनकाउंटर कर देते थे. भीड़ भाड़ को नियंत्रण करने में भी उनका कुशल नेतृत्व कारगर होता था. कई सामाजिक गतिविधियों में भी वे मुख्य अतिथि की भूमिका निभाते थे और युवाओं के आदर्श बन जाते थे. वे बहुत कम और संक्षिप्त बोलते थे, पर कुशल वक्तव्य से लोगों को खुश कर लेते थे. वे आज भी जमशेदपुर वासियों के चहेते हैं. कांग्रेस में वे एक काबिल नेता के रूप में हैं. वैसे भी फिलहाल कांग्रेस में काबिल नेताओं की कमी है. इसीलिए उनसे जनता को भी उम्मीदें हैं. हम सब उनके सफल भविष्य की कामना करते हैं. सफल लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष की भी आवश्यकता होती है जिसकी आज बेहद ही कमी महसूस की जा रही है. जय भारत ! जय लोकतंत्र! जय हिन्द!

-    जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर 

Saturday, 11 November 2017

जी एस टी में सुधार

गुवाहटी में हुई दो दिवसीय जीएसटी काउंसिल की बैठक में कुल 211 वस्तुओं की जीएसटी दरों में बदलाव किया गया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जीएसटी काउंसिल की बैठक के बाद बताया कि 178 वस्तुओं पर जीएसटी दर घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है. जीएसटी की नई दरें 15 नवंबर से लागू होंगी. 28 प्रतिशत वाले स्लैब में अब 228 वस्तुएं नहीं सिर्फ 50 वस्तुएं ही रह गई हैं. इसमें अब पान मसाला, सॉफ्ट ड्रिंक, तंबाकू, सिगरेट, सीमेंट, पेंट, एयर कंडीशनर, परफ्यूम, वैक्यूम क्लीनर, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, कार, दोपहिया वाहन और विमान इस स्लैब में रहेंगे. 
इन चीजों पर 28 प्रतिशत की जगह लगेगा 18 प्रतिशत टैक्स 
इलेक्ट्रिक कंट्रोल, डिस्ट्रीब्यूशन के लिए इलेक्ट्रिक बोर्ड, पैनल, कंसोल, कैबिनेट, वायर, केबल, इंसुलेटेड कंडक्टर, इलेक्ट्रिक इंसुलेटर, इलेक्ट्रिक प्लग, स्विच, सॉकेट, फ्यूज, रिले, इलेक्ट्रिक कनेक्टर्स, ट्रक (लोहे की पेटी), सूटकेस, ब्रीफकेस, ट्रैवलिंग बैग, हैंडबैग, शैंपू, हेयर क्रीम, हेयर डाई, लैंप और लाइट फिटिंग के सामान, शेविंग के सामान, डियोड्रेंट, परफ्यूम, मेकअप के सामान, फैन, पंप्स, कंप्रेसर, प्लास्टिक के सामान, शॉवर, सिंक, वॉशबेसिन, सीट्स के सामान, प्लास्टिक के सेनेटरी वेयर, सभी प्रकार के सिरेमिक टाइल, रेजर और रेजर ब्लेड, बोर्ड, सीट्स जैसे प्लास्टिक के सामान, पार्टिकल/फाइबर बोर्ड, प्लाईवुड, लकड़ी के बने सामान, लकड़ी के फ्रेम, फर्नीचर, गद्दे और बिस्तर, डिटर्जेंट, धुलाई और सफाई में इस्तेमाल होने वाले सामान,कटलरी, स्टोव, कुकर, नॉन इलेक्ट्रिक डोमेस्टिक एप्लाइंस, कपड़े, चमड़े के कपड़ों के सामान, संगमरमर, ग्रेनाइट के बने सामान, कलाई घड़ी, घड़ी और वॉच केस एवं उससे जुड़े सामान, ऑफिस, डेस्क इक्विपमेंट, सीमेंट, कंक्रीट और कृतिम पत्थर से बने सामान, वॉल पेपर, ग्लास के सभी प्रकार के सामान, इलेक्ट्रॉनिक वेट मशीन, अग्निशमक उपकरण, बुलडोजर्स, लोडर, रोड रोलर्स, एस्केलेटर, कूलिंग टॉवर, रेडियो और टेलीविजन प्रसारण के विद्युत उपकरण, साउंड रिकॉर्डिंग उपकरण, सभी प्रकार के संगीत उपकरण और उससे जुड़े सामान, कृत्रिम फूल, पत्ते और कृत्रिम फल, कोको बटर, वसा और तेल पाउडर, चॉकलेट, च्विंगम और बबलगम, रबर ट्यूब और रबर के बने तरह तरह के सामान, चश्में और दूरबीन.
18
के बजाए इन वस्तुओं पर लगेगा 12 फीसद जीएसटी
मधुमेह रोगियों को दिया जाने वाला भोजन,प्रिंटिंग इंक, टोपी,कृषि, बागवानी, वानिकी, कटाई से जुड़ी मशीनरी के सामान, जूट, कॉटन के बने हैंड बैग और शॉपिंग बैग, रिफाइंड सुगर और सुगर क्यूब, गाढ़ा किया हुआ दूध, पास्ता और सिलाई मशीन का सामान.
अब इन वस्तुओं पर 18 के बजाए लगेगा सिर्फ 5 फीसदी जीएसटी
चटनी पाउडर, पफ्ड राइस चिक्की, पीनट चिक्की, सीसम चिक्की, रेवड़ी, तिलरेवड़ी, खाजा, काजू कतली, ग्राउंडनट स्वीट गट्टा, कुलिया, नारियल का बुरादा, इडली और डोसा, कपास के बुने हुए कपड़े, तैयार चमड़ा, चमड़े से बने सामान, फ्लाई एश, फिशिंग नेट और फिशिंग हुक.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि जीएसटी परिषद की सिफारिशों से जनता को आगे फायदा होगा और टैक्स व्यवस्था को मजबूती मिलेगी. पीएम मोदी ने कहा कि जनता की भागीदारी सरकार के कामकाज के तौर तरीकों का मूल है और सरकार के सभी फैसले 'लोगों के अनुकूल' और लोगों के लिए हैं. ये सिफारिशें जीएसटी पर अनेक पक्षकारों से हमें लगातार मिल रहे फीडबैक पर आधारित हैं.' उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार देश के आर्थिक एकीकरण के लिए 'अथक' प्रयास कर रही है.
अब टीकाकारों का मानना है कि जीएसटी की भी नोटबंदी जैसी गत बन रही है. नोटबंदी में जिस तरह से रोज़रोज़ रद्दोबदल करने पड़े थे उसी तरह से जीएसटी में भी शुरू हो गए. नोटबंदी में जैसी बार-बार बदनामी हुई थी वैसी अब जीएसटी में होने लगी. अलबत्ता सरकार का पूरा अमला प्रचार करने में लगाया गया है कि जीएसटी की वसूली के रेट कम करने को जनता के लिए बड़ी राहत के तौर पर प्रचारित किया जाए. टीवी पैनल की चर्चाओं में यह बात खासतौर पर चलवाई जा रही है कि इससे गुजरात के व्यापारियों की नाराज़गी कम हागी. इस तरह से आरोप की शक्ल में इस प्रचार पर जो़र है कि गुजरात चुनाव के मददेनज़र यह फैसला किया गया है.
पहला सवाल यह कि क्या वाकई यह टैक्स गब्बर सिंह जैसा था जिसे अब कम भयावह बनाने का ऐलान हुआ है. अगर ऐसा है तो यह सवाल सबसे पहले कौंधेगा कि यह भारी भरकम टैक्स लगाया किसने था? जब लगाया गया था तब तर्क दिया गया था कि सरकार को देश के हित में बहुत सी योजनाएं चलानी पड़ती हैं. उसके लिए पैसे की जरूरत पड़ती है सो ऐशोआराम की चीज़ों पर ज्यादा टैक्स तो लगाना ही पड़ेगा. सो नया सवाल यह पैदा हुआ है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स घटाने से अब देश हित की योजनाएं चलाने में कमी नहीं आ जाएगी क्या? गौरतलब है कि खासतौर पर ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स वसूली के रेट घटाने से सरकार के ख़ज़ाने में बीस हजार करोड़ रुपए कम पहुंचेंगे.
नोटबंदी से मची भारी अफरातफरी और भारी घाटे का काम साबित होने के बाद जीएसटी से भी चारों तरफ परेशानियों का अंबार खड़ा होता जा रहा था. व्यापारी और उपभोक्ता दोनों परेशान हैं. हालांकि व्यापारी टैक्स के रेट से परेशान नहीं थे क्योंकि उन्हें टैक्स अपने पास से नहीं बल्कि नागरिकों से उगाही कर जमा करना था. व्यापारी लोग टैक्स भरने की समय खपाऊ और हिसाब बनाने की खर्चीली प्रक्रिया से परेशान हैं. सो उनके लिए भी सरकार ने टैक्स के कागज़ तैयार करने का बोझ कुछ कम कर दिया. क्या इसे पहले नहीं सोचा जा सकता था? इस तरह सरकार खुद को नौसिखिया साबित करवा रही है. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह नोटबंदी में साबित हुई थी. जानकार लोग नफे नुकसान का हिसाब भी बैठा रहे हैं. व्यापारी और नागरिक बेजा तरीके से खा न पाएं उससे सरकार को जितना पैसा बच सकता है उससे कई गुना उस चोरी न हो पाने का इंतजाम करने में खिन्न होकर बर्बाद तो नहीं हो रहा है? केंद्र और राज्य सरकारें अपने पास संसाधनों का रोना रोती रहती हैं. वे तरह तरह के जो टैक्स वसूलती थीं उसकी जगह एक ही टैक्स की व्यवस्था बनाने पर रजामंदी बनाई गई थी. यह रजामंदी इस आश्वासन पर बनी थी कि राज्यों को नई व्यवस्था से अगर कोई घाटा हुआ तो केंद्र सरकार उसकी भरपाई का इंतजाम करेगी. वैसे तो राज्य सरकारें बिल्कुल भी जोखिम उठाने को राजी नहीं होतीं लेकिन राजनीतिक परिदृश्य ऐसा है कि ज्यादातर राज्यों में भी भाजपा की ही सरकारें काबिज़ हैं. सो राज्य सरकारों की तरफ से केंद्र की इच्छा, मंशा या योजना पर नानुकुर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता लेकिन राज्यों के संसाधनों में कमी को आखिरकार उन्हें ही झेलना पड़ता है. वे किस तरह से झेलेंगी यह भी आने वाले दिनों में पता चलेगा. जीएसटी से नया हाहाकार न मचने लगे इसे दोनों प्रकार की सरकारों को सोचकर रखना पड़ेगा. सरकार के तरफदार विशेषज्ञों की सबसे दिलचस्प थ्योरी यह है कि जीएसटी की कंपलायंस यानी इसके मुताबिक टैक्स जमा होने में दिक्कत आ रही थी. उनका तर्क है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स कम होने से टैक्स जमा करने वालों की संख्या बढ़ जाएगी. इस तरह से उन्होंने दिलासा दिलाना शुरू किया है कि बदले ऐलान से सरकार के खजाने को 20 हजार करोड़ से कम का ही नुकसान होगा. ऐसा तर्क देने वाले क्या उस समय यह तर्क नहीं दे सकते थे जब 28 फीसद टैक्स वाली स्लैब बनाई गई थी.
इतना तो साफ है कि केन्द्र सरकार ने GST लागू करने में आवश्यक सावधानी नहीं बरती. प्रर्याप्त होमवर्क नहीं किया. यहां के बहु स्तरीय बाजार और सामान के उपभोग, उपयोग की प्रवृत्ति और प्रणाली का गंभीर अध्ययन नहीं किया. एक सही उद्देश्य मगर गलत चिंतन. दिल्ली से दौलताबाद वाली स्थिति इसी से पैदा हुई है. गुजरात चुनाव न होता तो यह विसंगत बनी रहती. उत्साह के साथ विवेक जरूरी होता है. ‘ईज ऑफ़ डूइंग बिजनेस’ का भी जोर शोर से प्रचार किया गया. अब दिन प्रतिदिन होने वाली तब्दीलियों से क्या परेशानियाँ कम होंगीं या जटिल होती जायेंगी. संकेत साफ़ है कि गुजरात चुनाव में जनता के गुस्से को भांपते हुए यह निर्णय लिया गया जिसे प्रधान मंत्री अपने भाषणों में करते रहे हैं और राहुल गाँधी उन पर इसी मुद्दे पर हमला करते रहे हैं. चाहे जो हो प्रधान मंत्री को कोई भी फैसला हड़बड़ी में नहीं करनी चाहिए और उनके सलाहकारों को भी समझ-बूझकर ही निर्णय करना चाहिए. तभी होगा सबका साथ और सबका विकास का सपना साकार! जयहिन्द!
जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.